*बिलासपुर के सिंधी समाज की समितियों की पारदर्शिता, लोकतांत्रिक अधिकार और सत्ता केंद्रित चेहरे पर सवाल उठाता है ?*
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📰 रोशनी न्यूज़ पोर्टल विशेष रिपोर्ट
📍 बिलासपुर, छत्तीसगढ़
🗓️ तारीख: 6 अगस्त 2025
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❗ “ नही चेहरे बदलते हैं, नही लोग नही सिस्टम क्यों ?”
बिलासपुर सिंधी समाज की 6 समितियों पर फिर उठा सवाल – क्या सब जगह एक ही सर्कल हावी है ?
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🔍 समाज की 6 प्रमुख समितियाँ कौन सी हैं आप को बताते है ?
बिलासपुर के सिंधी समाज में फिलहाल निम्न समितियाँ सक्रिय हैं:
1. पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत
2. झूलेलाल सेवा समिति
3. सिंधु चेतना
4. समाधान योजना
5. सिंधी युवा विंग
6. भारतीय सिंधु सभा
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि…
> “क्या यह अलग-अलग संगठन हैं या एक ही गुट का विस्तार ?”
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👥 हर समिति में वही नाम क्यों ?
समाज के लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है क्योंकि अधिकतर समितियों में सिर्फ कुछ गिने-चुने नाम ही घूमते रहते हैं:
> धनराज आहूजा, दिलीप बहरानी, जगदीश संतानी, शंकर मनचंदा, कमल बजाज, धीरज रोहरा, कलम कलवानी, दिलीप दयालानी, दिनेश नागदेव, अभिषेक विद्यानी, मुकेश विधानी, दयानंद तीर्थानी, राम सुखीजा, पि. एन बजाज, किशोर गेमनानी, प्रकाश ग्वालानी, डीडी आहूजा, रूपचंद डोडवानी…
*सवाल उठता है: क्या समाज में नए और युवा लोग नहीं बचे ?*
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🏛️ क्या वार्ड पंचायत महज़ औपचारिक बन गई है ?
वर्तमान में 40 पूर्व अधिकारियों को मतदान का अधिकार है लेकिन वार्ड पंचायत के अध्यक्षों और मुखियों को पूर्ण अधिकार नहीं दिया जाता।
क्या ये न्याय है ?
क्या यह नियम केवल सत्ता में मौजूद पुराने गुट को बनाए रखने के लिए बनाया गया है ?
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🔒 वार्ड मुखियों पर दबाव ?
चुनावों के वक्त वार्ड मुखियों पर दबाव बनाने की बातें बार-बार सामने आती हैं।
उन्हें मतदाता सूची में अपने मताधिकार से चुनाव करने के बजाय, निर्देशित सूची पर मुहर लगाने के लिए मजबूर किया जाता है।
> “क्या यह लोकतंत्र है या समाज में लोकतंत्र का दिखावा ?”
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📢 समाज पूछ रहा है…
सेन्ट्रल पंचायत की वार्ड युवा विंग को भी क्यों नही दिया जाता मतदान का अधिकार ?
क्या सभी समितियाँ बस एक ही चेहरा दिखाने का मंच बन गई हैं ?
क्या वार्ड स्तर की पंचायतें सिर्फ नाम की रह गई हैं ?
क्या यह “सेवा” है या “सत्ता की विरासत”?
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📣 अब वक्त है बदलाव का!
समाज को चाहिए सत्यापन योग्य वोटिंग प्रक्रिया
युवा नेतृत्व को खुला अवसर
और सबसे ज़रूरी: सत्ता का विकेंद्रीकरण
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*📌 रोशनी न्यूज़ पोर्टल टीम अब इस विषय की अगली कड़ी में लाएगी: “2016 से अब तक — कितने ज्ञापन गुम हुए, कितनी शिकायतें दबी ?”*
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