रोशनी न्यूज़ :- बिलासपुर
✍️ समाज की बात, खुलकर और साफ़-साफ़
*दावेदारी का पैमाना धन-दौलत या चेहरे की “बिकाऊ” छवि बन जाए, तो यह समाज के मूल्यों पर प्रश्नचिह्न है ?*
बात को बिंदुवार समझें:
बंद कमरे की राजनीति या खुले मंच का नेतृत्व?
सेन्ट्रल पंचायत में अपमानजनक टिप्पणी, अब युवा विंग का चुनाव क्या दोहराएगा वही कहानी ?
बिलासपुर सिंधी समाज में इन दिनों चुनावी हलचल तेज़ है। एक ओर जहां सेन्ट्रल पंचायत के संभावित दावेदारों के नाम सामने आए थे, वहीं अब युवा विंग के अध्यक्ष पद को लेकर मंथन शुरू हो चुका है।
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सेन्ट्रल पंचायत के संभावित दावेदारों में से एक सम्माननीय और सेवाभावी व्यक्ति को बंद कमरे में यह कहकर किनारे कर दिया गया कि –
> “तुम्हारा चेहरा ऐसा नहीं है कि तुम्हें देखकर कोई 5 करोड़ का दांव लगा दे या इतना कलेक्शन आ जाए।”
यह बयान सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज के मूल्य और सम्मान पर चोट है। क्या अब समाज की सेवा का मापदंड चेहरा और चंदा रह गया है? क्या जिनके पास धन नहीं, वे समाज का नेतृत्व नहीं कर सकते?
🔍 युवा विंग में भी वही मॉडल?
युवा विंग की बैठक में चार नाम सामने आए हैं —
1. रोबिन वाधवानी
2. पवन वाधवानी
3. नीरज जाग्यासी
4. बंटी वाधवानी
अब सवाल उठता है:
क्या यह बैठक भी बंद कमरे में होगी?
क्या यहां भी वही चयन होगा जिसका आधार पिता की संपत्ति, परिवार की हैसियत, और रंगीन दिखावे की राजनीति होगी?
या इस बार कोई असली सेवाभावी, जमीनी कार्यकर्ता आगे आएगा, जिसे समाज का हर वर्ग जानता और सम्मान देता है?
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📢 समाज से सवाल – जवाब ज़रूरी है!
👉 क्या सिर्फ “बड़े आदमी का बेटा” होना ही नेतृत्व की पात्रता बन गया है?
👉 क्या चेहरों की चमक सेवा की चमक से ज़्यादा कीमती हो गई है?
👉 क्या बिलासपुर सिंधी समाज अपनी कमान ऐसे हाथों में देना चाहेगा जो अंदरूनी सौदेबाज़ी से चुने जाएं?
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⏳ समय बताएगा…
समय ही बताएगा कि बिलासपुर सिंधी समाज अपने भविष्य के लिए नेता चुनता है या सिर्फ नाम।
लेकिन आज ज़रूरत है सवाल पूछने की —
📌 पारदर्शिता कहां है?
📌 सेवा के असली सिपाही कहां हैं?
📌 समाज कब जागेगा?
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🗣 रोशनी न्यूज़ हर उस सवाल को उठाएगा, जो दबा दिया गया, और हर उस आवाज़ को बुलंद करेगा, जिसे दबाने की कोशिश की गई।
✒️ बोलिए, सोचिए, पूछिए – क्योंकि समाज आपसे है, और जवाबदेही भी आपकी है।
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🔴 1. सेन्ट्रल पंचायत के चुनाव की स्थिति
जब एक प्रबल दावेदार को यह कहकर हटा दिया गया कि “तुम्हारा चेहरा ऐसा नहीं है कि 5 करोड़ का कलेक्शन हो जाए”, तो यह केवल उस व्यक्ति का नहीं, पूरे समाज का अपमान है।
ऐसी सोच यह दर्शाती है कि निर्णय सेवा भाव या योग्यता पर नहीं बल्कि धनबल या प्रचार क्षमता पर आधारित हो रहे हैं।
यह मामला यदि विश्वसनीय सूत्रों से सत्य है, तो यह न केवल उस व्यक्ति की औकात गिनाना है, बल्कि समाज के सच्चे सेवकों का मनोबल तोड़ना भी है।
🔴 2. अब युवा विंग का चुनाव सामने
चार नाम सामने आए हैं, पर अब सवाल यह है कि क्या यहां भी बंद कमरे में निर्णय होगा?
क्या यहां भी वही पैमाना चलेगा – “बाप की हैसियत”, “पारिवारिक सम्पत्ति”, या “सामाजिक रसूख”?
या फिर इस बार समाज खुले रूप में पारदर्शिता, जन भागीदारी और योग्यता के आधार पर निर्णय लेगा?
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समाज के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न:
1. क्या युवा विंग का नेतृत्व सच में समाज सेवा के लिए चुना जाएगा, या सिर्फ नाम के लिए कोई बड़ा आदमी का बेटा बैठा दिया जाएगा?
2. क्या सेन्ट्रल पंचायत और युवा विंग दोनों के चयन में अब “आम समाजजन” की आवाज़ शामिल होगी?
3. क्या समाज के बुज़ुर्ग और समझदार लोग ऐसे अपमानजनक बर्ताव पर चुप रहेंगे या खुलकर बोलेंगे?
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निष्कर्ष:
बिलासपुर सिंधी समाज एक ऐतिहासिक, समृद्ध और बुद्धिजीवी समाज रहा है — अब समय आ गया है कि यह समाज यह तय करे कि वो किस दिशा में जाना चाहता है:
धनबल और चेहरों की राजनीति की ओर?
या सेवाभाव, पारदर्शिता और ईमानदार नेतृत्व की ओर?
🕒 समय जवाब देगा, पर सवाल पूछना आज जरूरी है।
