“न्याय या नियमों की आड़ में राजनीति?” — सेन्ट्रल पंचायत के विवाद समाधान प्रस्ताव पर उठते सवाल

📰 “न्याय या नियमों की आड़ में राजनीति?” — सेन्ट्रल पंचायत के विवाद समाधान प्रस्ताव पर उठते सवाल

दिनांक: 20 जुलाई 2025 | स्थान: बिलासपुर | रिपोर्ट: रोशनी न्यूज़ पोर्टल टीम

सेन्ट्रल पंचायत का नया विवाद समाधान प्रस्ताव – सुनने में अनुशासन, पढ़ने में नियंत्रण और असल में बचाव का दस्तावेज!

बिलासपुर की पूज्य सिंधी सेन्ट्रल पंचायत द्वारा हाल ही में पारित किया गया विवाद निपटान का प्रस्ताव अब सवालों के घेरे में है। प्रस्ताव में विवाह विच्छेद, संपत्ति विवाद, और पारिवारिक झगड़ों के समाधान हेतु जो नियम बनाए गए हैं, वो पंचायत के “सामाजिक न्याय” के नाम पर निजी हितों की रक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी जैसे प्रतीत हो रहे हैं।

🔍 पंचायत या अदालत ? अधिकार की सीमा लांघता प्रस्ताव

वैवाहिक विवादों से लेकर ज़मीन-जायदाद तक, पंचायत यह तय करेगी कि कौन क्या लौटाएगा, कितना मुआवज़ा देगा और क्या-क्या बताना अनिवार्य होगा। और यदि कोई पहले से पुलिस या कोर्ट में गया है — तो पंचायत आंखें मूंद लेगी!
सवाल उठता है कि फिर पंचायत का उद्देश्य क्या है? न्याय या औपचारिकता?

🧾 पहले ही निर्णय मानने की शर्त – क्या यह लोकतंत्र है या मजबूरी का नाम महात्मा गांधी ?

किसी भी पक्षकार को प्रस्ताव में यह शर्त दी गई है कि वह पहले से पंचायत के फैसले को स्वीकारने की लिखित सहमति दे।
यानी बिना सुने, पहले ही ‘हाँ’ लिखो – वरना बाहर निकलो!

क्या यह निष्पक्षता है या पंचायत के पास फर्जी वैधता जुटाने का तरीका?

🏠 वार्ड पंचायत बनाम सेन्ट्रल पंचायत – असली शक्ति कहां ?

कहा गया है कि सभी विवाद पहले वार्ड पंचायत में जाएं। लेकिन अंतिम निर्णय की शक्ति आखिरकार सेन्ट्रल पंचायत के पास ही रहेगी।
यानी पहले छोटी पंचायत में सुनवाई का नाटक, फिर निर्णय वहीं होगा जहां पहले से स्क्रिप्ट तैयार है।

📢 खुला सवाल – क्या यह नियम आमजन के लिए हैं या चुनिंदा चेहरों को बचाने के लिए ?

इस पूरे प्रस्ताव में कहीं भी पारदर्शिता, तटस्थता या अपील की व्यवस्था नहीं है।
पंचायत के सदस्यों पर सवाल उठाना वर्जित, न्याय के नाम पर बस ‘मौन स्वीकृति’ ही विकल्प!

क्या यह प्रस्ताव समाज को जोड़ता है या “खास लोगों” के खिलाफ उठ रही आवाज़ों को दबाता है?

✍️ रोशनी न्यूज़ की दो टूक –

> “जहां नियम न्याय नहीं, बल्कि नियंत्रण का हथियार बन जाएं – वहां सवाल पूछना धर्म है।”

 

हमारा सवाल सीधा है — क्या ये प्रस्ताव विवादों का समाधान हैं या पंचायत की छवि चमकाने और जवाबदेही से बचने का तरीका?
समाज को चाहिए खुला संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही — न कि आदेशों की पर्ची जिसमें पहले ‘हाँ’ लिखो, फिर सुनवाई हो।

अगर आप भी इस विषय पर कुछ कहना चाहते हैं या आपके पास कोई अनुभव है – न्यूज़ पोर्टल को लिखें, क्योंकि सवाल पूछना हमारा अधिकार है।

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