बिलासपुर सिंधी समाज के नाम एक खुला पत्र // समाज की चुप्पी की वजह ? // 🏛 आम सभा – हकीकत या नाटक ?

 


📰 रोशनी न्यूज़ पोर्टल – बेबाक सवाल …

बिलासपुर सिंधी समाज के नाम एक खुला पत्र

📌 बिलासपुर में सिंधी समाज के कितने मतदाता हैं ? 

 

क्या आपको लगता है कि सिर्फ 5,500 ?
असलियत – आंकड़े बताते हैं 30,000 से 40,000 मतदाता
तो फिर झूठे आंकड़े क्यों फैलाए जाते हैं ?
क्या समाज को गुमराह करना आसान है ?

📌 अगर 10% गिनें तो

  • 30,000 का 10% = 3,000
  • 40,000 का 10% = 4,000
    तो इतनी ताक़त होते हुए भी समाज चुप क्यों है?

📌 समाज की चुप्पी की वजह ?

  • क्या समाज सवाल पूछना पसंद नहीं करता ?
  • क्या लोग परिवार और बड़े-बुज़ुर्ग के सम्मान के नाम पर चुप रहते हैं ?
  • या फिर सिर्फ अपना व्यापार और निजी काम संभालना ही काफी समझते हैं ?

📌 जमीन का मामला
अगर समाज के नाम पर सरकार से जमीन दान में ली गई, तो वहां व्यवसाय क्यों चल रहा है ?
दान का मतलब – समाज के काम, न कि निजी मुनाफा।

📌 आम सभा – नाम की या असली ?

📌 नेतृत्व की सच्चाई

जिसको अध्यक्ष बनाने की तैयारी है, क्या उसने

📌 पूर्व मुखियों का अपमान

 


💬 सवाल साफ है
जब सोशल मीडिया के दौर में सच छुपाना मुश्किल है, तो भी समाज को क्यों मूर्ख बनाया जा रहा है?
क्या अब भी चुप रहना सही है?


“सच छुपा है… या समाज चुप है ?”


📊 बिलासपुर सिंधी समाज – मतदाता का सच

  • क्या सिर्फ 5,500 वोटर हैं ? ❌
  • असल आंकड़ा – 30,000 से 40,000 मतदाता ✅
  • 10% ताकत = 3,000 से 4,000 निर्णायक वोट!
    तो फिर, आंकड़े गलत क्यों बताए जाते हैं ?

विधायक, सांसद, पार्षद, महापौर चुनाव में** ये वोटर पूरे शहर में फैले होते हैं, इसलिए अगर समाज एकजुट होकर वोट करे तो निर्णायक भूमिका निभा सकता है, लेकिन बिखराव और गुटबाजी के कारण अक्सर असर कम हो जाता है।


जब समाज के नाम पर कोई जमीन, सुविधा या सरकारी मदद मिलती है, तो उसका उपयोग **100% समाज के हित** में होना चाहिए। अगर उसपर निजी कारोबार, किराये का धंधा या व्यक्तिगत लाभ हो रहा है, तो यह सीधे-सीधे **विश्वासघात** है ?

 

– **पारदर्शिता की कमी**

– **बंद कमरे की राजनीति**

– **सिर्फ अपने लोगों को आगे लाने की प्रवृत्ति**

– और **दान व जमीन का गलत इस्तेमाल** पर है।

 

🤐 चुप्पी के कारण – सोचने लायक

  • समाज सवाल पूछना पसंद नहीं करता ?
  • बड़ों का सम्मान = गलत पर भी चुप्पी ?
  • व्यापार और निजी काम ही प्राथमिकता ?

 

**बंद हॉल, चुनिंदा लोग, तय सवाल** → ये असल में *औपचारिक बैठक* है, न कि लोकतांत्रिक आम सभा।

– असली आम सभा तब होती है जब **सभी वार्ड के लोग**, चाहे पदाधिकारी हों या नहीं, **खुले मंच** पर सवाल-जवाब कर सकें।

– आज सवाल करने वालों को *”अपमानित”, “बागी”, “समस्या खड़ी करने वाला”* कहकर चुप करा दिया जाता है, इसलिए लोग चुप रहते हैं।


🏢 जमीन का सच

सरकार से दान में मिली जमीन = समाज का हित
लेकिन वहां व्यवसाय ?
दान का मतलब – सेवा, न कि निजी मुनाफा !


🏛 आम सभा – हकीकत या नाटक ?

  • बंद हॉल, 17 वार्ड मुखिया, सेन्ट्रल के 45 लोग
  • युवा विंग भी इन्हीं के अंदर
  • सवाल करने की हिम्मत? → इज्जत खराब का डर
    असली आम सभा = खुले मैदान में, सभी वार्ड के लोग, खुला मंच

👑 नेतृत्व की “योग्यता”

  • वार्ड पंचायत का अनुभव ? ❌
  • संकट काल (कोविड) में सेवा ? ❌
  • समाजहित का ठोस काम ? ❌
    ✅ बस चेहरा और पैसा – क्या यही मापदंड है ?

🚨 पूर्व मुखि का अपमान

तुम्हारा चेहरा योग्य नहीं, तुम्हें देख कर कोई 5 करोड़ का दान नहीं देगा” – बिलासपुर के सबसे बड़े वार्ड के पूर्व मुखिया को बोल गया ?
क्या यह समाज के सेवक से बात करने का तरीका है ?
कितनों को ये पता है ?

उसके बाद भी लोग मानसिक संतुलन खराब हैं क्या ?


❓ अंतिम सवाल

सोशल मीडिया के दौर में भी
क्या समाज को मूर्ख बनाना आसान है ?
या हम चुप रहकर खुद इसमें हिस्सेदार हैं ?

 

अगर किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनाना है, तो कम से कम ये होना चाहिए:

समाज में **पूर्व नेतृत्व अनुभव** (वार्ड या संस्था का)

– **पारदर्शी कार्यों का रिकॉर्ड**

– **संकट के समय सेवा का सबूत** (जैसे कोविड काल)

– **निजी स्वार्थ से ऊपर समाजहित का एजेंडा**

अगर इन चीजों के बिना केवल “चेहरा”, “पैसा”, या “गुट” देखकर चयन हो रहा है, तो यह समाज के साथ धोखा है।  

समाज का पतन नजदीक हैं फिरसवाल