*पहले भी जनवरी में एक पत्रकार के खिलाफ इसी तरह झूठी शिकायत कर जेल भेजा गया।*
*उच्च अधिकारी मौन हैं और पत्रकारों के भीतर रोष है।*
*सुशील पाठक जैसे चर्चित हत्याकांड का भी आज तक खुलासा नहीं हुआ।*
*लगातार पत्रकारों को निशाना बनाना संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।*
*📌 क्या हो रहा है?*
पुलिस व्यवस्था में जब राजनैतिक, आर्थिक या स्थानीय दबाव हावी हो जाता है, तब ऐसी घटनाएं होती हैं। पत्रकार जिनका काम है जनता की आवाज़ उठाना, जब वही निशाना बनते हैं तो लोकतंत्र की रीढ़ कमजोर होती है।
*📌 क्यों खामोश हैं उच्च अधिकारी?*
या तो वो भी दबाव में हैं
या मामले को राजनीतिक या सामाजिक विवाद मान कर नजरअंदाज कर रहे हैं
या पत्रकारों में एकजुटता की कमी होने से प्रशासन को लग रहा है कि मामला दब जाएगा
*📌 सुशील पाठक केस का संदर्भ:*
बिलासपुर के चर्चित पत्रकार सुशील पाठक की हत्या आज भी अनसुलझी है, जो इस बात का संकेत है कि पत्रकार सुरक्षा कभी प्राथमिकता में रही ही नहीं।
*📌 क्या किया जा सकता है?*
1. पत्रकारों का एकजुट मंच: बिलासपुर और छत्तीसगढ़ स्तर पर पत्रकार संगठनों को सशक्त कर इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराना चाहिए।
2. राज्य मानवाधिकार आयोग व प्रेस काउंसिल को लिखित शिकायत: ताकि मामला राष्ट्रीय स्तर पर उठे।
3. RTI और उच्च न्यायालय में याचिका: FIR की जांच और थाने की भूमिका को लेकर।
4. सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यम पर जागरूकता: ताकि दबाव बन सके।
*📌 निष्कर्ष:*
पत्रकारों पर झूठी FIR, हमला या हत्या — ये सब लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है। अगर पत्रकार असुरक्षित हैं, तो आम जनता की आवाज़ कौन उठाएगा?
