“पूज्य सिंधी सेन्ट्रल पंचायत बिलासपुर” पर सवालों की बौछार – क्या लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाया जा रहा है ?*

*📰 “पूज्य सिंधी सेन्ट्रल पंचायत बिलासपुर” पर सवालों की बौछार – क्या लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाया जा रहा है?* 

रोशनी न्यूज़ :- बिलासपुर बेबाक ✍️ सवाल 

 

बिलासपुर। सिंधी समाज, जो सदियों से व्यापार, संस्कृति और समाज सेवा के लिए जाना जाता है, आज खुद अपने ही नेतृत्व और पारदर्शिता के अभाव से सवालों के घेरे में है। पूज्य सिंधी सेन्ट्रल पंचायत बिलासपुर पर कई वर्षों से एक ही व्यक्ति को मुख्य चुनाव अधिकारी बनाए जाने पर समाज के भीतर भारी नाराजगी उभर रही है।

 *🔴 2016 से अब तक – एक आवेदन की चुप्पी ?* 

 

 *किस अंग्रेज कुत्ते कि गुलामी कर रहें है ?* 

2016 में समाजसेवी किशोर कृपलानी ने अध्यक्ष पद हेतु दावेदारी की थी। उन्होंने मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए लिखित में आवेदन दिया। आरोप था कि सूची में कुछ क्षेत्रों में मतदाता अनुचित रूप से अधिक और कहीं अत्यधिक कम हैं।

 

विशेष रूप से शनिचरी-पड़ाव क्षेत्र में लगभग 70-80 घरों की वास्तविक संख्या के मुकाबले 270 मतदाता दर्ज थे। सवाल उठता है:

👉 क्या हर घर में 3-4 मतदाता भी हैं तो इतनी संख्या कैसे?

👉 क्या मतदाता सूची को राजनीतिक रूप से प्रभावित किया गया?

 *❗ मतदाता सूची सार्वजनिक क्यों नहीं ?* 

 

 *2016 से अब तक समाज कि मतदान सूची लोगो को क्यों नही दिखा रहें है ?*  

 

 *क्या सूची इनके बाप कि जागीर है क्या ?* 

चुनाव के नाम पर बंध्यान (मेम्बरशिप) फॉर्म भरवाए जाते हैं, चंदा लिया जाता है, समाज से सहयोग माँगा जाता है, फिर भी ना तो बंध्यान सूची, ना वोटर लिस्ट सार्वजनिक की जाती है। ?

 

क्या समाज के लोग सिर्फ “भीड़” हैं?

 

क्या पारदर्शिता से डरते हैं पंचायत के कर्ता-धर्ता?

 

क्यों हर चुनाव में वही चेहरे, वही पदाधिकारी ?

🗣️ “क्या समाज बंधक है?” – उठी आवाजें

 

कई लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि समाज में कुछ तथाकथित “प्रभावशाली लोग” समाज को अपनी जागीर समझते हैं।

यहाँ तक कि एक नागरिक ने तीखे शब्दों में कहा:

 

> “हमारे सवाल पूछने पर हमें गुलाम समझा जाता है। समाज का पैसा खाने वालों से हिसाब मांगना अब क्रांति है?”

 

 *🧾 दान में मिली ज़मीन, समाज से मांगा सहयोग – तो जवाबदेही कहाँ ?* 

 

पूज्य सिंधी पंचायत को शहर में सरकारी और समाजिक रूप से दी गई ज़मीनें, भवन, संसाधन सब समाज की संपत्ति हैं।

👉 फिर यह संपत्ति कुछ गिने-चुने लोगों के नियंत्रण में क्यों?

👉 चुनाव के नियम हर बार बदल क्यों जाते हैं?

👉 क्या नियम सत्ता में बैठे लोगों के लिए ही बनते हैं?

*🧭 क्या वार्ड मुखियाँ सिर्फ चाटुकार हैं ?* 

 

समाज के वार्ड स्तर के प्रतिनिधियों यानी मुखियाँ और वार्ड अध्यक्ष भी अब सवालों के घेरे में हैं।

👉 क्या वे सिर्फ आदेश पालन करते हैं?

👉 क्या उनमें अपने समाज के हित में आवाज़ उठाने का साहस नहीं?

📢 अब समाज जाग रहा है – क्रांतिकारी सवाल उठने लगे हैं

 

एक नई सोच, एक नई लहर उठ रही है। कुछ लोग अब खुलकर पूछ रहे हैं:

 

समाज का माल कौन खा रहा है?

 

किसके इशारे पर रिमोट से पंचायत चलाई जा रही है?

 

क्या हर सवाल उठाने वाला “ग़लत” है?

 

क्या ये पंचायत एक परिवार या गुट की जागीर बन चुकी है?

 

📣 समाप्ति नहीं, शुरुआत है – न्यूज़ पोर्टल सवाल पूछता रहेगा

 

हमारा उद्देश्य है बेबाक अंदाज़ में समाज से जुड़े हर उस सवाल को उठाना जो दबाया जा रहा है।

हम आपसे पूछते हैं:

 

> क्या आप भी सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं ?

📌 अपना नाम मत दीजिए — सवाल उठाइए।

📌 चुनाव को त्योहार नहीं, ज़िम्मेदारी समझिए।

📌 आपका समाज है, गुलामी नहीं।